इंसानों का पहला नायक, जिसके आगे धरती माता ने किया सरेंडर

आज हम आपको उस नायक की गाथा सुनाने जा रहे हैं, जो सही मायने में इंसानों का पहला नायक कहलाने का हकदार है। धरती के मनुष्यों का पहला बड़ा नायक हुआ था महाराज पृथु, जिसकी कहानी बेहद दिलचस्प है।

महाराज पृथु के लिए जनता पागल थी। एक बार की बात है महाराज पृथु ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए पृथ्वी को ही दौड़ा लिया था। दरअसल पृथु जब राजा बने, तब सृष्टि को पैदा हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था।

तब न अनाज होता था, न कोई गाय पालता था, न खेती होती थी और न व्यापार… प्रजा सिर्फ फल-फूल खाकर ही अपना गुजारा करती थी। ऐसे में सारी प्रजा एकमत होकर खाने-पीने का कुछ इंतजाम करवाने के लिए महाराज पृथु के पास पहुंची।

जिसके बाद महाराज पृथु को गुस्सा आ गया। फिर उन्होंने अपना धनुष-बाण उठाया और पृथ्वी को खदेड़ लिया और उनसे पूछा कि तुम मेरी प्रजा की जिंदगी क्यों नहीं बचाती।

इस तरह महाराज पृथु के रौद्र रूप को देखकर पृथ्वी माता गाय का रूप बनाकर हर लोक में भागीं। लेकिन परमप्रतापी पृथु हरबार उन्हें सामने से ही आते दिखाई दिए। हारकर पृथ्वी माता ने आत्म समर्पण कर दिया और कहा कि तुम मेरा वध न करो। तुम जो बोलोगे मैं करूंगी।

पृथ्वी माता तब गाय रूप में थीं। उन्होंने महाराज पृथु से कहा कि पहले तुम मेरे लिए कोई बछड़ा देखो, जिसके लिए मैं स्नेहयुक्त होकर दूध दे सकूं… दूसरा काम ये करो कि मैं ऊबड़-खाबड़ हूं, तो मुझे समतल कर दो, जिससे मेरा दूध सब ओर बह सके।

बस इतना सुनते ही महाराज पृथु ने अपना धनुष-बाण उठाया और उसकी नोक से लाखों पर्वत उखाड़ डाले और उन्हें एक जगह पर जमा कर दिया। इससे काफी जमीन समतल हो गई। समतल जगह पर ही प्रजा रहने लगी।

फिर मनु को बछड़ा बनाकर राजा पृथु ने पृथ्वी माता को सौंप दिया। जिसके बाद जहां-जहां उनका दूध पहुंचा, वो जमीन उपजाऊ हो गई और हर तरह के अनाज को पैदा करने लगी।

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